मध्य प्रदेश सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना जारी करके राज्य वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन किया. इस नए बोर्ड में 10 सदस्य हैं, जिनमें पहली बार दो हिंदू सदस्य मनोज मालपानी (इंदौर) और अनिमेष भार्गव (राघौगढ़) शामिल किए गए हैं. बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल को फिर से नियुक्त किया गया है. इसके साथ ही मध्य प्रदेश वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है. लेकिन अब सवाल उठता है कि 2 हिंदू सदस्यों के शामिल होने से अच्छा असर पड़ेगा या बुरा?
इससे पहले वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत राज्य वक्फ बोर्ड के सभी सदस्यों का मुस्लिम होना अनिवार्य था. वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 में यह प्रावधान जोड़ा गया कि प्रत्येक राज्य वक्फ बोर्ड में कम-से-कम दो गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे. मध्य प्रदेश सरकार ने वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 13(1) और धारा 14 के तहत बोर्ड का गठन किया है.
नए 10-सदस्यीय बोर्ड की पूरी टीम में:
डॉ. सनव्वर पटेल (इंदौर) अध्यक्ष हैं, हिंदू सदस्यों में मनोज मालपानी (इंदौर) और अनिमेष भार्गव (गुना) हैं. इनके अलावा नजमा हेपतुल्ला (नई दिल्ली), आतिफ अकील (भोपाल उत्तर से विधायक), फैजान खान (उज्जैन), सिस्टर फातिमा चौधरी (इंदौर), शाइस्ता सुल्तान (भोपाल की पार्षद), शबाना खान (रतलाम की पार्षद), पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण आयुक्त शामिल हैं.
इस फैसले से क्या अच्छा होगा?
एक्सपर्ट्स् के मुताबिक, इस फैसले से 4 बड़े फायदे मिलते हैं:
1. पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी
वक्फ बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सनव्वर पटेल और मंत्री विश्वास सारंग का कहना है कि यह फैसला पारदर्शिता, बेहतर प्रबंधन और वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा के उद्देश्य से लिया गया है. सरकार का दावा है कि इससे बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता आएगी और वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में सुधार होगा.
2. वक्फ माफिया पर लगाम
नए हिंदू सदस्य अनिमेष भार्गव ने विरोध करने वालों को वक्फ माफिया करार दिया है. उन्होंने कहा कि जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनका खेल अब खत्म हो रहा है क्योंकि बोर्ड में पारदर्शिता और कानूनी निगरानी आ रही है. यानी इस फैसले से वक्फ संपत्तियों में होने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगने की उम्मीद है.
3. कानून का पालन होगा
यह फैसला संसद से पारित कानून के तहत लिया गया है. बोर्ड अध्यक्ष ने साफ कहा है कि यह देश संविधान से चलेगा. यानी सरकार कानूनी प्रावधानों का पालन कर रही है.
4. महिलाओं को भी मिला प्रतिनिधित्व
बोर्ड अध्यक्ष के मुताबिक, इस बार बोर्ड में दो हिंदू सदस्यों के साथ-साथ दो महिलाओं को भी शामिल किया गया है, जो एक सकारात्मक कदम है.
क्या इस फैसले से बुरे नतीजे भी निकलेंगे?
1. मुस्लिम संगठनों का कड़ा विरोध
ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि वक्फ मुस्लिम समाज की धार्मिक और सामाजिक संस्था है, जहां लोग अपनी संपत्ति अल्लाह की रजा के लिए वक्फ करते हैं. ऐसे में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति ठीक नहीं है.
2. भोपाल में विरोध प्रदर्शन
सोमवार (6 जुलाई) को भोपाल के बुधवारा चौराहे पर ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी के पदाधिकारियों और सदस्यों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने सरकार से फैसला वापस लेने की मांग की.
3. धार्मिक मामलों में दखल की आशंका
मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह धार्मिक मामलों में दखल देने जैसा है. कुछ स्थानीय मुस्लिमों ने अशांति की चेतावनी दी है और कहा है कि अगर हिंदू मंदिर ट्रस्टों में मुस्लिमों को शामिल नहीं किया जाता, तो वक्फ बोर्ड में हिंदुओं को भी नहीं होना चाहिए.
4. मुस्लिम स्कॉलर का सवाल
मुस्लिम स्कॉलर इमरान खोखर ने सवाल उठाया है कि जिन लोगों को इस्लाम के बारे में जानकारी नहीं, उनको बोर्ड का सदस्य बनाकर सरकार क्या मैसेज देना चाहती है?
कानून और संविधान का पहलू
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में वक्फ (संशोधन) अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई के दौरान सवाल उठाया था कि क्या वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया जा सकता है. कोर्ट ने साफ कहा था कि वक्फ बोर्ड के सभी सदस्य मुस्लिम होने चाहिए, सिवाय पदेन सदस्यों के. हालांकि, संसद ने 2025 में कानून में संशोधन करके गैर-मुस्लिम सदस्यों का प्रावधान जोड़ दिया.
वक्फ बोर्ड अध्यक्ष ने इस मुद्दे पर सफाई देते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड और मस्जिद अलग-अलग संस्थाएं हैं, यानी वक्फ बोर्ड सिर्फ मस्जिदों का नहीं, बल्कि वक्फ संपत्तियों (जो मस्जिद, कब्रिस्तान, दरगाह, मदरसे, जमीन आदि हो सकती हैं) के प्रबंधन के लिए है.



