पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई है. प्रदेश अध्यक्ष को लेकर शुरू हुई नाराजगी अब संगठन और आलाकमान की प्रतिष्ठा से जुड़ती दिख रही है. इसी संकट को संभालने के लिए कांग्रेस के पंजाब प्रभारी महासचिव और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पांच दिवसीय पंजाब दौरे पर हैं.
महासचिव बघेल का मिशन सिर्फ संगठन की समीक्षा नहीं, बल्कि नाराज़ नेताओं को साधकर चुनाव से पहले पार्टी को एकजुट करना भी है. भूपेश बघेल लगातार चंडीगढ़ में वरिष्ठ नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें कर रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रीय सचिव और सह प्रभारी सूरज ठाकुर, मेनिफेस्टो कमेटी के चेयरमैन डॉ. अमर सिंह, समन्वय समिति के चेयरमैन विजेंद्र सिंघला समेत तमाम नेताओं से मुलाकात की. पंजाब के कार्यकारी अध्यक्षों के साथ बैठक हुई, जबकि जिलाध्यक्षों की बैठक भी जारी है.
महासचिव भूपेश बघेल ने ABP News से कहा कि उनका पूरा फोकस संगठन को मजबूत करने और कांग्रेस की सत्ता में वापसी की रणनीति तैयार करने पर है. उन्होंने दावा किया कि सभी नेता एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरेंगे.
अध्यक्ष पद बना विवाद की जड़
सूत्रों के अनुसार, पंजाब कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री पद की दावेदारी रखते हैं. ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का पद सबसे अहम राजनीतिक केंद्र बन गया. स्थानीय निकाय चुनावों के बाद प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के खिलाफ असंतोष तेज हुआ और एक बड़ा वर्ग नेतृत्व परिवर्तन की मांग करने लगा.
हालांकि, कांग्रेस आलाकमान ने लंबी कवायद के बाद राजा वडिंग पर ही भरोसा बरकरार रखा. बताया जाता है कि आठ दौर की बैठकों, चुनावी रणनीतिकार सुनील कोनुगोलु की रिपोर्ट और बड़े नेताओं की सिफारिशों के बाद यह फैसला लिया गया. साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव प्रचार समिति की कमान दी गई, जबकि अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी अलग-अलग समितियों में जिम्मेदारियां देकर संतुलन बनाने की कोशिश की गई. आलाकमान की रणनीति जाट सिख, दलित सिख और हिंदू समुदाय के बीच राजनीतिक संतुलन बनाने की थी, लेकिन इसके बावजूद असंतोष खत्म नहीं हुआ.
चन्नी खेमे के तेवर, राहुल गांधी तक बात पहुंचाने की तैयारी
सूत्रों का कहना है कि अध्यक्ष पद नहीं मिलने से नाराज चरणजीत सिंह चन्नी ने अपने समर्थक नेताओं के साथ बैठक कर शक्ति प्रदर्शन किया. चन्नी खेमा अब अपनी बात सीधे राहुल गांधी के सामने रखना चाहता है. पार्टी के भीतर माना जा रहा है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह का टकराव कांग्रेस के लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है.
आलाकमान की प्रतिष्ठा भी दांव पर
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अब मामला सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष का नहीं, बल्कि आलाकमान की प्रतिष्ठा का भी बन गया है. पार्टी को राजस्थान का 2022 वाला घटनाक्रम याद है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खेमे ने पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खरगे और अजय माकन की बुलाई विधायक दल की बैठक नहीं होने दी थी. उस घटनाक्रम को तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी के अधिकार को चुनौती माना गया था. बाद में गहलोत के सार्वजनिक खेद जताने के बावजूद उन्हें कोई बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं मिली.
ऐसे में यदि पंजाब में कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल की बुलाई बैठकों का भी बहिष्कार होता है, तो इसे सीधे आलाकमान की अवहेलना के तौर पर देखा जा सकता है.
रंधावा की अमित शाह से मुलाकात भी चर्चा में
सोशल मीडिया पर भी शक्ति प्रदर्शन
हाल ही में चरणजीत सिंह चन्नी ने सुखजिंदर रंधावा, परगट सिंह, राणा गुरजीत सिंह समेत कई नेताओं के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा था “Unity is Strength.” हालांकि, इस पर प्रतिक्रिया देने के बजाय प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग ने उसी पोस्ट को रीपोस्ट कर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की.
फिलहाल, पंजाब कांग्रेस का यह अंदरूनी संघर्ष सिर्फ प्रदेश की राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है. पार्टी नेतृत्व इस बात से भी चिंतित है कि यदि दबाव में कोई बड़ा फैसला लिया गया, तो इसका असर दूसरे राज्यों में भी पड़ सकता है. ऐसे में कांग्रेस आलाकमान का पूरा फोकस चुनाव और सगठन पर है. प्रभारी महासचिव भूपेश बघेल सभी नेताओं को साधने में लगे हुए है.



