सुपरस्टार आमिर खान ने 61 साल की उम्र में गौरी स्प्रैट के साथ शादी करके अपनी निजी जिंदगी का एक नया सफर शुरू किया है, लेकिन यह शादी जितनी निजी थी, उतनी ही तेजी से सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय बना दी गई. महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे ने इस शादी को ‘लव जिहाद’ और ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसे शब्दों से जोड़ने की कोशिश की. सवाल यह है कि क्या दो वयस्कों का कानूनी विवाह भी अब राजनीतिक बहस का मुद्दा बनेगा? और क्या किसी नागरिक की निजी जिंदगी पर राजनीतिक बयानबाजी संविधान की भावना के अनुरूप है?
सबसे पहले कानून की बात. भारत के संविधान और कानून में स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की व्यवस्था है. यही वह कानून है जिसके तहत अलग-अलग धर्मों के दो वयस्क बिना धर्म परिवर्तन किए कानूनी रूप से विवाह कर सकते हैं. इस कानून का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि विवाह किसी धर्म परिवर्तन की शर्त पर निर्भर न हो. किसी भी पक्ष पर अपना धर्म बदलने का कोई कानूनी दबाव नहीं होता.
रीना-किरण से तलाक के बाद की तीसरी शादी
आमिर खान और गौरी स्प्रैट ने भी इसी कानूनी व्यवस्था के तहत अपनी शादी दर्ज कराई है. भारतीय कानून में बहुविवाह अपराध है, लेकिन आमिर खान का उनकी पहली पत्नी रीना दत्ता और दूसरी पत्नी किरण राव दोनों से विधिवत तलाक हो चुका है. जब पिछली शादियां कानूनी रूप से समाप्त हो जाती हैं, तब किसी भी नागरिक को दोबारा या तीसरी बार विवाह करने का पूरा अधिकार है. यानी कानून के लिहाज से आमिर खान ने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया.
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. अगर कोई व्यक्ति संविधान और कानून का पालन करते हुए अपनी निजी जिंदगी का फैसला ले रहा है, तो उसे राजनीतिक विवाद में क्यों घसीटा जा रहा है? महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नितेश राणे आखिर इस विवाह में ‘लव जिहाद’ का एजेंडा क्यों तलाश रहे हैं?
संविधान देता है जीवनसाथी चुनने का अधिकार
संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीने और अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है. वहीं अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है. सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि दो वयस्कों के आपसी सहमति से हुए विवाह में राज्य या समाज का हस्तक्षेप उचित नहीं है. इसके बावजूद यदि किसी नागरिक के निजी निर्णय को धार्मिक या राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, तो यह कई संवैधानिक सवाल खड़े करता है.
नितेश राणे की आलोचना सिर्फ राजनीतिक विरोधियों ने ही नहीं की. विरोधियों का कहना है कि अगर आमिर खान की पहली पत्नी रीना दत्ता, दूसरी पत्नी किरण राव, उनके बेटे जुनैद, बेटी आयरा और पूरा परिवार इस शादी के साथ खड़ा है, तो फिर किसी मंत्री को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? अगर परिवार को समस्या नहीं है, तो राजनीति को क्यों है?
आमिर खान की शादी की सबसे खास बात यही रही कि उनकी दोनों पूर्व पत्नियां भी समारोह का हिस्सा बनीं. आमिर के बच्चे भी इस खुशी में शामिल हुए. यह उस रिश्ते की परिपक्वता दिखाता है जिसमें विवाह भले समाप्त हो गया हो, लेकिन सम्मान और रिश्ते खत्म नहीं हुए. सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में आमिर खान, गौरी स्प्रैट, किरण राव, रीना दत्ता और बेटा आज़ाद एक ही गाड़ी में साथ बैठे दिखाई दिए. दुनिया जहां तलाक के बाद रिश्तों में कटुता देखती है, वहां यह तस्वीर बिल्कुल अलग मैसेज देती है.
1986 में की रीना दत्ता से की शादी
आमिर खान की निजी जिंदगी का इतिहास भी इसी परिपक्वता की कहानी कहता है. उन्होंने 1986 में रीना दत्ता से विवाह किया. करीब 16 साल साथ रहने के बाद दोनों अलग हुए और 2002 में तलाक हो गया. इसके बाद 2005 में उन्होंने किरण राव से शादी की. 2021 में दोनों का तलाक हो गया, लेकिन उसके बाद भी दोनों साथ काम करते रहे और सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त करते रहे. 2022 में एक कार्यक्रम में खुद आमिर ने कहा था कि रिश्ता खत्म होने का मतलब सम्मान खत्म होना नहीं होता.
अब आमिर की जिंदगी में गौरी स्प्रैट आई हैं. गौरी की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी दिलचस्प है. उनके पिता तमिल-ब्रिटिश मूल के हैं और मां पंजाबी-आयरिश हैं. उनके दादा फिलिप स्प्रैट ब्रिटेन से भारत आए थे और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मजदूर आंदोलनों से जुड़े. मशहूर मेरठ षड्यंत्र केस में भी उनका नाम सामने आया था. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक Rebels Against the Raj में उनका उल्लेख किया है.
राजनीतिक बयानबाजी के बीच आमिर खान के सामाजिक योगदान की चर्चा भी जरूरी है. आमिर सिर्फ फिल्मों के सुपरस्टार नहीं हैं. वह करीब दस वर्षों तक भारत सरकार के ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ और ‘अतिथि देवो भव’ अभियान का चेहरा रहे. उन्होंने महाराष्ट्र में पानी फाउंडेशन की स्थापना की, जिसने जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन के लिए व्यापक अभियान चलाए. उस समय भी महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार थी और सरकार ने स्वयं आमिर की इस पहल की सराहना की थी.
सूखे से जूझते गांवों में जाकर किसानों के साथ काम करना, जल संरक्षण को जनआंदोलन बनाना और हजारों लोगों को इससे जोड़ना आमिर खान की पहचान का बड़ा हिस्सा रहा है. सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति के पूरे सामाजिक योगदान को भूलकर सिर्फ उसकी शादी को राजनीतिक मुद्दा बना देना उचित है?
भारतीय फिल्म उद्योग में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. आदित्य पंचोली और जरीना वहाब, ऋतिक रोशन और सुजैन खान, किशोर कुमार और मधुबाला जैसे कई अंतर्धार्मिक विवाह भारतीय समाज का हिस्सा रहे हैं. ऐसे विवाहों पर शायद ही कभी वैसी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली जैसी आमिर खान की शादी पर देखने को मिल रही है.
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बिहार में बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने फूंका पुतला
आमिर खान की शादी के विरोध में बिहार के अररिया में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनका पुतला भी फूंका, लेकिन सवाल यही है कि क्या किसी नागरिक की निजी जिंदगी पर इस तरह की सार्वजनिक प्रतिक्रिया उचित है, जबकि उसका विवाह पूरी तरह कानून के दायरे में हुआ हो? लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं. राजनीतिक असहमति भी लोकतंत्र का हिस्सा है. लेकिन जब किसी नागरिक के निजी और कानूनी फैसले को धार्मिक पहचान के आधार पर विवाद का विषय बनाया जाता है, तो बहस सिर्फ एक शादी की नहीं रह जाती. वह संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की बहस बन जाती है.
आमिर खान और गौरी स्प्रैट की शादी को लेकर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है. लेकिन कानून, संविधान और अदालतों के फैसले एक बात स्पष्ट करते हैं, अगर दो वयस्क अपनी इच्छा से, कानून के दायरे में रहकर विवाह करते हैं, तो वह उनका निजी अधिकार है. लोकतंत्र की असली ताकत भी यही है कि नागरिकों को अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की स्वतंत्रता मिले. आखिरकार सवाल सिर्फ इतना है कि अगर दो वयस्क, उनका परिवार और कानून सभी इस रिश्ते के साथ हैं, तो फिर इस शादी में सबसे बड़ी समस्या आखिर किसे है?



