खुले मैनहोल से मौत, जलभराव से जाम, गिरते पेड़ों से हादसे… आखिर कब बदलेगी मुंबई की तस्वीर?

खुले मैनहोल से मौत, जलभराव से जाम, गिरते पेड़ों से हादसे… आखिर कब बदलेगी मुंबई की तस्वीर?


मुंबई बेचारी क्यों? ये सवाल हर मानसून में फिर से खड़ा हो जाता है. देश की आर्थिक राजधानी, देश की सबसे अमीर महानगरपालिका और अरबों रुपये का सालाना बजट… लेकिन पहली ही तेज बारिश के बाद मुंबई की रफ्तार थम जाती है. सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, गाड़ियां पानी में डूब जाती हैं, ट्रेनें प्रभावित होती हैं, लोग घंटों जाम में फंस जाते हैं और कई बार तो घर से निकला इंसान जिंदा वापस भी नहीं लौट पाता. सवाल सिर्फ बारिश का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो हर साल एक जैसी त्रासदी के बावजूद सबक नहीं लेती.

दर्दनाक हादसे के साथ हुई मानसून की शुरुआत

इस बार भी मानसून की शुरुआत एक दर्दनाक हादसे के साथ हुई. मुंबई के साकीनाका इलाके में 55 वर्षीय असलम शेख सड़क पर चलते-चलते खुले मैनहोल में गिर गए. सीसीटीवी फुटेज में साफ दिखाई देता है कि वह फोन पर बात करते हुए सामान्य तरीके से चल रहे थे. कुछ सेकंड के लिए एक टेंपो ट्रैवलर उनके सामने से गुजरता है और जैसे ही वाहन हटता है, असलम वहां दिखाई नहीं देते. वह खुले मैनहोल में समा चुके थे. करीब चार घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद उनका शव दूसरे मैनहोल से बरामद हुआ. यह हादसा किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुआ. बीएमसी ने सफाई के लिए मैनहोल का ढक्कन खुला छोड़ा था, लेकिन वहां न बैरिकेड लगाए गए, न चेतावनी बोर्ड और न ही सुरक्षा के कोई इंतजाम किए गए.

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हादसे के बाद जिम्मेदारी लेने के बजाय बीएमसी के अधिकारी एक-दूसरे पर दोष मढ़ते नजर आए. डिप्टी मेयर ने निजी ठेकेदार को जिम्मेदार ठहरा दिया, जबकि वार्ड अधिकारी कैमरे के सामने सवालों से बचते रहे. लेकिन सवाल आज भी वही है कि आखिर एक आम नागरिक की जान की कीमत क्या है? क्या मुंबई में सड़क पर चलना भी अब जोखिम भरा हो चुका है? असलम शेख अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले थे और अब उनका परिवार मुआवजे और न्याय की मांग कर रहा है.

हर साल पानी में डूबती है मुंबई

असलम की मौत कोई अकेली घटना नहीं है. हर साल मानसून आते ही मुंबई, ठाणे, वसई, विरार और आसपास के इलाके पानी में डूब जाते हैं. अंधेरी सबवे जैसी जगहों पर कुछ ही मिनटों में पानी भर जाता है. जहां कुछ देर पहले सामान्य ट्रैफिक चल रहा होता है, वहां देखते ही देखते गाड़ियां फंस जाती हैं, ऑटो चालक वाहन छोड़कर बाहर निकल आते हैं और पूरा इलाका आपातकाल जैसी स्थिति में बदल जाता है. लोग पानी में कमर तक डूबकर अपने घर पहुंचने की कोशिश करते हैं. यह दृश्य हर साल दोहराया जाता है, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकाला जा सका.

मुंबई की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ भारी बारिश नहीं, बल्कि उसका कमजोर ड्रेनेज सिस्टम है. शहर के निचले इलाकों में जब तेज बारिश और समुद्र में हाई टाइड एक साथ आते हैं, तब बारिश का पानी समुद्र में नहीं जा पाता. नतीजा यह होता है कि सड़कें तालाब बन जाती हैं. मौसम विभाग और प्रशासन को पहले से पता होता है कि कौन-कौन से इलाके हर साल जलभराव की चपेट में आते हैं, लेकिन दशकों बाद भी उन स्थानों पर प्रभावी ड्रेनेज व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी.

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मानसून से अर्थव्यवस्था प्रभावित 

मानसून का असर सिर्फ जनजीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. कारोबार प्रभावित होता है, लाखों कार्य घंटे बर्बाद होते हैं, लोकल ट्रेन और बस सेवाएं बाधित होती हैं, स्कूल बंद करने पड़ते हैं, ऑनलाइन डिलीवरी और आपूर्ति व्यवस्था ठप पड़ जाती है और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचता है. शिकागो यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार, मुंबई में मानसून के दौरान हर साल लगभग 2,300 से 2,700 लोगों की मौत होती है और इसकी आर्थिक लागत करीब 10 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है.

पिछले साल आई थी विनाशकारी बाढ़

मुंबई 26 जुलाई 2005 की विनाशकारी बाढ़ को आज भी नहीं भूली है. उस दिन 24 घंटे में 944 मिलीमीटर बारिश हुई थी और सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी. उस हादसे के बाद स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम को मजबूत करने, फ्लड वॉर्निंग सिस्टम विकसित करने और नालों की नियमित सफाई जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए गए थे. पिछले 20 वर्षों में कुछ सुधार जरूर हुए हैं, लेकिन जिस गति से शहर का विस्तार हुआ, उसी अनुपात में बुनियादी ढांचे का विकास नहीं हो पाया. यही वजह है कि आज भी पहली भारी बारिश के साथ मुंबई की परीक्षा शुरू हो जाती है.

बारिश के मौसम में एक और बड़ा खतरा पेड़ बन चुके हैं. हाल ही में चेंबूर में एक स्कूल बस पर पेड़ गिर गया, जिसमें एक छात्र की मौत हो गई. कई अन्य स्थानों पर भी पेड़ गिरने से लोग घायल हुए. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024 में पेड़ गिरने की 653 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 855 तक पहुंच गई. विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण और फुटपाथ निर्माण के दौरान पेड़ों के चारों ओर कंक्रीट भर दी जाती है. इससे जड़ों तक न पानी पहुंचता है और न ऑक्सीजन. धीरे-धीरे पेड़ अंदर से कमजोर हो जाते हैं और तेज बारिश या हवा में अचानक गिर पड़ते हैं.

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राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी पेड़ के चारों ओर कम से कम एक मीटर का क्षेत्र कंक्रीट से मुक्त होना चाहिए, लेकिन मुंबई के कई इलाकों में इस नियम का पालन नहीं किया जाता. यही वजह है कि हर मानसून में पेड़ भी ‘साइलेंट किलर’ बनकर लोगों की जान ले रहे हैं.

पहली बारिश में खुल जाती है सिस्टम की पोल

मुंबई की असली त्रासदी यह नहीं कि यहां बारिश ज्यादा होती है. दुनिया के कई बड़े शहरों में इससे कहीं अधिक बारिश होती है, लेकिन वहां जीवन पूरी तरह नहीं रुकता. असली समस्या यह है कि यहां हर साल वही गलतियां दोहराई जाती हैं. करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली बारिश आते ही शहर की सच्चाई सामने आ जाती है. सवाल सिर्फ मौसम का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है. जब तक प्रशासन, नगर नियोजन और बुनियादी ढांचे में दीर्घकालिक सुधार नहीं होंगे, तब तक हर मानसून मुंबई के लिए विकास नहीं, बल्कि डर, अव्यवस्था और त्रासदी का दूसरा नाम बना रहेगा.