TMC Crisis: क्या TMC के बागी सांसद एक्शन से बच पाएंगे? मर्जर दावे के बीच एंटी-डिफेक्शन कानून पर छिड़ी बहस

TMC Crisis: क्या TMC के बागी सांसद एक्शन से बच पाएंगे? मर्जर दावे के बीच एंटी-डिफेक्शन कानून पर छिड़ी बहस


तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने रविवार (14 जून 2026) को लोकसभा स्पीकर को जानकारी दी कि उन्होंने एक ऐसी राजनीतिक पार्टी में मर्जर कर लिया है, जिसके पास देश में किसी भी स्तर पर एक भी निर्वाचित सीट नहीं है. माना जा रहा है कि यह कदम एंटी-डिफेक्शन कानून यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई से बचने के लिए उठाया गया है. इसी वजह से यह मामला अब एक बड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है. इससे पहले इसी साल आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों के मामले में भी ऐसा ही सवाल सामने आया था.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल सांसदों का एक समूह खुद किसी दूसरी पार्टी में मर्जर का ऐलान कर सकता है या फिर जिस राजनीतिक पार्टी के टिकट पर वे चुने गए हैं, उस मूल पार्टी की भी सहमति जरूरी होती है. इस सवाल का अंतिम और स्पष्ट जवाब अभी सुप्रीम कोर्ट को देना बाकी है.

ये भी पढ़ें: इधर यूएस-ईरान में डील का ऐलान, उधर भारत सरकार का LPG और पेट्रोल को लेकर आ गया बड़ा बयान

भारत में एंटी-डिफेक्शन कानून को कैसे लागू किया गया?

भारत में एंटी-डिफेक्शन कानून संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत लागू किया गया था. इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था. इसका उद्देश्य उन नेताओं को रोकना था जो चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते थे और सरकारों को अस्थिर करते थे. इस कानून के अनुसार यदि कोई सांसद या विधायक अपनी इच्छा से पार्टी छोड़ देता है या सदन में पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है. शुरुआत में इस कानून में दो अपवाद थे. पहला था स्प्लिट अगर किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक या सांसद अलग हो जाते थे तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता था, लेकिन 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए इस प्रावधान को हटा दिया गया, क्योंकि इसका लगातार गलत इस्तेमाल हो रहा था.

संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 में क्या है?

अब केवल मर्जर का प्रावधान बचा है. संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के अनुसार अगर मूल राजनीतिक पार्टी किसी दूसरी पार्टी में विलय करती है और उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक इस फैसले से सहमत होते हैं, तब दलबदल कानून लागू नहीं होगा. यानी कानून में दो शर्तें बताई गई हैं. पहली, मूल राजनीतिक पार्टी का मर्जर का फैसला और दूसरी, कम से कम दो-तिहाई विधायी दल की सहमति. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की हार और राज्य में BJP की सरकार बनने के बाद पार्टी के अंदर असंतोष बढ़ा. इसके बाद पार्टी के कई सांसद खुले तौर पर बागी हो गए. पूर्व चीफ व्हिप काकोली घोष दस्तीदार इस बगावत का बड़ा चेहरा बनकर सामने आईं. उनके साथ पूर्व फ्लोर लीडर सुदीप बंदोपाध्याय, डिप्टी लीडर शताब्दी रॉय, अभिनेता दीपक अधिकारी, सायोनी घोष, जून मलैया, पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान और पूर्व भारतीय फुटबॉल कप्तान प्रसून बनर्जी सहित कई सांसद शामिल बताए गए.

मर्जर होने पर TMC के साथ क्या होगा?

19 बागी सांसद खुद रविवार को  लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिले और उन्हें अपने पत्र सौंपे. बीसवीं सांसद रचना बनर्जी ने मलेशिया से पत्र भेजकर अपनी सहमति दी. इन सांसदों ने स्पीकर को बताया कि उन्होंने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में मर्जर कर लिया है. यह पार्टी वर्ष 2022 में पंजीकृत हुई थी और आखिरी बार 2023 में चुनाव लड़ी थी. फिलहाल उसके पास किसी भी स्तर पर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है. बताया जा रहा है कि इस पार्टी को इसलिए चुना गया ताकि बागी सांसदों का पश्चिम बंगाल से जुड़ाव बना रहे और पूर्वोत्तर भारत में भी एक प्रतीकात्मक राजनीतिक आधार दिखाया जा सके. अगर इस मर्जर को मान्यता मिल जाती है तो इसके राजनीतिक परिणाम काफी बड़े हो सकते हैं. लोकसभा में TMC की संख्या लगभग 28 से घटकर 8 रह जाएगी. राज्यसभा में भी पार्टी की संख्या पहले ही 13 से घटकर 10 हो चुकी है. वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की लोकसभा में संख्या 294 से बढ़कर 314 तक पहुंच सकती है. हालांकि यह अभी भी दो-तिहाई बहुमत से 46 सीट कम होगी.

अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखा

इस घटनाक्रम के बाद TMC नेतृत्व ने भी तुरंत कदम उठाया. पार्टी के लोकसभा फ्लोर लीडर अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अब किसी प्रकार का अलग गुट या बंटवारा मान्य नहीं है और तृणमूल कांग्रेस एक ही राजनीतिक पार्टी है. उन्होंने मांग की कि किसी भी अलग समूह को पार्टी की मान्यता या सुविधा न दी जाए. उन्होंने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट पर सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी हवाला दिया. उस फैसले में अदालत ने कहा था कि राजनीतिक पार्टी और उसका विधायी दल दो अलग-अलग संस्थाएं हैं. केवल विधायी दल की संख्या के आधार पर पार्टी की पहचान तय नहीं की जा सकती. इसी आधार पर TMC का कहना है कि सांसदों का कोई समूह खुद से दूसरी पार्टी में मर्जर का दावा नहीं कर सकता.

सांसद कपिल सिब्बल ने क्या कहा?

वरिष्ठ वकील और सांसद कपिल सिब्बल ने भी कहा कि TMC के सांसद अपने स्तर पर किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय नहीं कर सकते. ऐसा तभी संभव है जब स्वयं TMC पार्टी ऐसा फैसला करे. उन्होंने बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है. TMC नेतृत्व ने संकेत दिया है कि अगर जरूरत पड़ी तो वह अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकता है. इससे पहले AAP के सात सांसदों के मामले में भी ऐसा कानूनी विवाद सामने आया था. इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह है कि क्या पैराग्राफ 4 के तहत केवल दो-तिहाई सांसदों का समर्थन पर्याप्त है या फिर मूल राजनीतिक पार्टी का आधिकारिक मर्जर भी जरूरी है. संविधान की भाषा में “ओरिजिनल पॉलिटिकल पार्टी” का उल्लेख किया गया है, जिसका मतलब पूरी पार्टी है, केवल सांसदों का समूह नहीं.

महाराष्ट्र मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में महाराष्ट्र मामले में कहा था कि विधायी दल राजनीतिक पार्टी से अलग होकर उसकी पहचान तय नहीं कर सकता. अदालत ने साफ कहा था कि दोनों अलग संस्थाएं हैं. इस आधार पर कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सांसदों का समूह अपने आप मर्जर नहीं कर सकता. हालांकि मामला पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. वर्ष 2022 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने गोवा के एक मामले में यह माना था कि यदि किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी में चले जाते हैं तो उसे मर्जर माना जा सकता है, भले ही मूल राजनीतिक पार्टी का औपचारिक फैसला सामने न आया हो. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और मामला अभी विचाराधीन है.

ये भी पढ़ें: 75 रुपये वाली पार्टी में शामिल होंगे ममता के बागी सांसद, NCP के बारे में और क्या-क्या पता चला?