नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI)… एक पार्टी जिसे 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज 840 वोट मिले, जिसके तीनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. इसके पास 2022-23 में सिर्फ 75 रुपये नकद बचे थे. फिर अचानक एक दिन वही पार्टी लोकसभा की सबसे बड़ी क्षेत्रीय ताकतों में से एक बन जाती है- 20 सांसदों के साथ. 15 जून 2026 को NCPI अचानक भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गई. तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने इस अल्पज्ञात पार्टी के साथ विलय का ऐलान कर दिया. यह कदम इतना चौंकाने वाला था कि खुद NCPI के कुछ संस्थापक सदस्यों को भी इसकी भनक नहीं थी. आखिर यह NCPI क्या है, इतिहास क्या रहा है, TMC के बागी सांसदों ने इसी पार्टी को क्यों चुना और इस विलय का भारतीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा…
NCPI का जन्म: एक NGO से पार्टी बनने तक सफर
NCPI का सफर 2020 में शुरू हुआ. इसे मूल रूप से एक ऐसे मंच के रूप में बनाया गया था, जो जनजातीय कल्याण, राष्ट्रवाद और शासन सुधार पर फोकस करे. हालांकि इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में था, लेकिन पार्टी ने अपनी शुरुआती संगठनात्मक मौजूदगी त्रिपुरा में बनाई.
जनवरी 2023 में NCPI ने चुनाव आयोग में एक रजिस्टर्ड अनरिकग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी(RUPP) के रूप में पंजीकरण कराया. पार्टी का रजिस्टर्ड पता हावड़ा जिले के संकरैल इलाके में एक मकान था, जो उत्तिया कुंडू और उनकी पत्नी शिवली कुंडू की संपत्ति है.
दिलचस्प बात यह है कि यह मकान सिर्फ पार्टी दफ्तर नहीं था. इसमें एक NGO (जागो बिश्वा), एक बांग्ला साप्ताहिक अखबार और एक असंगठित महिला श्रमिक संघ भी चलता था. स्थानीय लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि यहां कोई राजनीतिक पार्टी भी है. एक स्थानीय निवासी ने कहा, ‘हम सभी इसे एक NGO के रूप में जानते थे जो अनाथ बच्चों की शिक्षा के लिए काम करता है.’
पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शांतनु दे (शांतनु साहा) का नाम आता है, जो खुद को पार्टी का राष्ट्रीय संगठन सचिव बताते हैं. हालांकि बाद में इन्हीं की पहचान को लेकर विवाद भी हुआ.
NPCI का चुनावी सफर: 840 वोट और जमानत जब्त
NCPI का चुनावी इतिहास बेहद मामूली रहा है. पार्टी ने अब तक सिर्फ 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में ही चुनाव लड़ा है.
पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की, लेकिन चार की नॉमिनेशन खारिज हो गईं. आखिरकार चावामानु, अम्बासा, करामचरा और कैलाशहर सीटों पर चुनाव लड़ा. पार्टी का चुनाव चिह्न ‘पेन निब’ (कलम की नोक) था.
चुनावी नतीजों में NCPI को कुल 840 वोट मिले. यह राज्य में कुल वैध वोटों का सिर्फ 0.03% था. तीनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. चावामानु सीट पर NCPI उम्मीदवार बर्जेदा त्रिपुरा को 536 वोट मिले, जो NOTA (500 वोट) से महज 36 वोट ज्यादा थे. पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ा.
NCPI का 2023 का चुनाव नारा काफी मजेदार था- ‘अपने अधिकारों को बचाने के लिए, राजनीतिक दलबदलुओं को अस्वीकार करें. सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन करें, राजनीतिक हस्तियों का नहीं.’ यही पार्टी अब दलबदलुओं की पनाहगाह बन गई है.
NCPI की आर्थिक स्थिति भी उतनी ही कमजोर थी जितनी उसकी चुनावी ताकत:
- 2022-23 के वित्तीय वर्ष के अंत में पार्टी के पास सिर्फ 75 रुपये नकद बचे थे.
- पार्टी को कुल 1.13 लाख रुपये का दान मिला था.
- पार्टी का दफ्तर एक आवासीय मकान था, जहां एक NGO, एक अखबार और एक महिला संघ भी चलता था.
- 2023 के पंचायत चुनावों में NCPI ने 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन सभी हार गए.
यह वही पार्टी है जिसे अब 20 सांसदों का समर्थन हासिल है. जो NDA का दूसरा सबसे बड़ा घटक बन गया है.
20 TMC सांसदों ने NCPI को क्यों चुना?
इसके पीछे कई कानूनी पेच हैं:
- दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत, अगर कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता जा सकती है. लेकिन अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होता. TMC के लोकसभा में कुल 28 सांसद थे. 20 सांसद दो-तिहाई से भी ज्यादा हैं. इसलिए यह गुट कानूनी तौर पर TMC से अलग हो सकता था, बिना अपनी सदस्यता खोए.
- यहां एक और पेच है कि अगर ये सांसद बिना किसी पार्टी के अलग होते, तो उन्हें संसद में अलग समूह के रूप में मान्यता नहीं मिलती. इसलिए उन्हें किसी मौजूदा पार्टी में विलय करना पड़ा. इसी कानूनी जरूरत ने NCPI को चुना. एक ऐसी पार्टी जो पश्चिम बंगाल-केंद्रित है और जिसका कोई मजबूत नेतृत्व नहीं है, इसलिए बागी सांसदों को अपनी मर्जी से चलने की आजादी मिलेगी.
- NCPI ने सोशल मीडिया पर एक ग्राफिक शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि पश्चिम बंगाल में NCPI के 20 सांसद हैं, BJP के 12, TMC के 8 और कांग्रेस के 1. पार्टी ने कहा, ’20 लोकसभा सीटों के साथ, NCPI पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय ताकत के रूप में उभरती है.’ बड़ा बागी सांसदों में काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंदोपाध्याय, सातब्दी रॉय और यूसुप पठान जैसे नेता शामिल हैं. इन सांसदों ने लोकसभा में अलग से बैठने की व्यवस्था की मांग की और घोषणा की कि वे NDA के साथ काम करेंगे.
NDA को मिला बड़ा झटका या बड़ा फायदा?
NDA के लिए यह एक बड़ी जीत है. NCPI अब NDA का दूसरा सबसे बड़ा घटक बन गया है. इससे पूर्वी भारत में NDA की मौजूदगी मजबूत हुई है. पश्चिम बंगाल में TMC कमजोर हुई है. TMC के लिए यह एक बड़ा झटका है. पार्टी के 28 में से 20 सांसद यानी 71% अलग हो गए. TMC के प्रवक्ता नीलांजन दास ने तंज कसा, ‘जो लोग ट्विन फ्लावर्स (TMC का चुनाव चिह्न) पर जीते थे, वे अब उस पार्टी में शरण मांग रहे हैं जिसके बारे में बंगाल ने कभी नहीं सुना.’
NCPI के लिए यह एक ऐतिहासिक मौका है, लेकिन चुनौती भी है. पार्टी को अब अपनी अचानक मिली संसदीय ताकत को एक स्थायी राजनीतिक संगठन में बदलना है. सवाल यह है कि क्या NCPI एक अस्थायी वाहन बनकर रह जाएगी या एक स्थायी राष्ट्रीय ताकत.
विपक्ष के लिए यह एक चेतावनी है कि दल-बदल का खेल कितना आसान हो गया है, बशर्ते आपके पास दो-तिहाई सांसद हों.
840 वोट से 20 सांसदों तक: एक ऐतिहासिक राजनीतिक छलांग
NCPI की कहानी भारतीय राजनीति की सबसे अनोखी कहानियों में से एक है. एक पार्टी जिसे 2023 में महज 840 वोट मिले, जिसके पास 75 रुपये नकद थे, जिसका दफ्तर एक NGO और अखबार के साथ एक आवासीय मकान में था, वही पार्टी आज लोकसभा की बड़ी ताकत बन गई है.
यह भारतीय लोकतंत्र की खूबी भी है और कमजोरी भी. खूबी इसलिए कि यहां कोई भी छोटी पार्टी बड़ी बन सकती है. कमजोरी इसलिए कि जनादेश की कोई कीमत नहीं रह गई है. 840 वोट और 20 सांसद, दोनों एक ही पार्टी के नाम हो सकते हैं, बशर्ते दो-तिहाई सांसद आपके साथ हों.



