देश में आए दिन कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जिसमें धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण को लेकर विवाद होता है. एक ऐसे ही मामले को लेकर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार (26 जून, 2026) को एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. मामले में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उन आदेश को भी असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि हिंदू धर्म की पिछड़ी (BC), अति-पिछड़ी (OBC) या अनुसूचित जाति (SC) से अगर कोई व्यक्ति इस्लाम को अपनाकर मुस्लिम बन जाता है तो ऐसे लोगों को बैकवर्ड क्लास मुस्लिम का दर्जा दिया जाएगा और इसके साथ ही उन्होंने आरक्षण भी दिया जाएगा.
मद्रास हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
वहीं, मद्रास हाईकोर्ट में जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस पीबी बालाजी की दो जजों की बेंच ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘कोई भी व्यक्ति इस्लाम को अपनाने के बाद सिर्फ एक मुसलमान ही बनता है, बस बात यहीं खत्म. वो बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के दर्जे और आरक्षण का दावा बिल्कुल भी नहीं कर सकता है.’
किस मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला?
दरअसल, यह मामला तमिलनाडु के थूथुकुड़ी जिले के निवासी समीर अहमद की तरफ से दर्ज कराई गई याचिका के बाद सामने आया है. समीर अहमद का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था और उसका नाम परमशिवम था, लेकिन साल 2015 में उसने इस्लाम को अपना लिया और अपना नाम समीर अहमद रख लिया. इसके बाद उन्होंने मुस्लिम रीति-रिवाजों के हिसाब से शादी भी की. यहां तक सब ठीक था, लेकिन धर्म परिवर्तन करने के बाद जब समीर ने तहसीलदार को मुस्लिम लेब्बाई जाति का सर्टिफिकेट लेने आवेदन दिया, तो तहसीलदार ने उसके आवेदन को खारिज कर दिया. बता दें कि मुस्लिम लेब्बाई जाति को तमिलनाडु में पिछड़े वर्ग के मुसलमानों का दर्जा मिला हुआ है.
तहसीलदार की तरफ से आवेदन खारिज होने के बाद समीर ने मद्रास हाईकोर्ट ने इसके खिलाफ याचिका दाखिल की. उसने अपनी याचिका में तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च, 2024 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले मुसलमानों को आरक्षण देने की बात कही गई थी. वहीं, इस मामले को लेकर तमिलनाडु सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि कनवर्ट होने वाले लोगों को आरक्षण इसलिए दिया जा रहा है ताकि वह अपनी पुरानी आरक्षित श्रेणी का फायदा उठा सकें. हालांकि, मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया.
सिर्फ जन्म से तय होती है समुदाय की सदस्यता- हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा, ‘मुस्लिम समाज में भी कई ऐसे समुदाय हैं, जिनकी सदस्यता सिर्फ उस समुदाय में जन्म लेने से ही तय होती है, बेझिझक ऐसा कहा जा सकता है कि वे हिंदू धर्म की जातियों की तरह ही हैं. जैसे हिंदू धर्म में जाति जन्म से तय होती है, उसी तरह से कोई भी व्यक्ति जब राउथर, मरक्कयार या दक्कानी मुस्लिम समुदाय में जन्म लेता है, तभी वह उस समुदाय का सदस्य कहलाता है, लेकिन ऐसा कहना पूरी तरह से बेतुका है कि किसी को मुस्लिम समुदाय में बदला जा सकता है.’
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