Suspense Over Rajasthan CM: राजस्थान की राजनीति में महारानी के नाम से मशहूर वसुंधरा राजे की सियासत पर इन दिनों ग्रहण लगा हुआ है. दो बार प्रदेश की सीएम रह चुकीं वसुंधरा राजे पिछले एक साल से पार्टी में हाशिए पर हैं. चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें साइडलाइन ही रखा गया. अब जबकि पार्टी भारी बहुमत से जीती है तो भी पार्टी ने उन्हें सीएम का विकल्प नहीं माना है. हालांकि वह रेस में हैं, लेकिन आलाकमान उनके साथ नजर नहीं आ रहा.
अब बड़ा सवाल ये उठता है कि 5 बार की विधायक, पांच बार सांसद और दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे के बिना जब राज्य का कोई भी सियासी समीकरण पूरा नहीं होता है, तो फिर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता उनसे दूरी क्यों बना रहे हैं, जबकि विधायकों का एक बड़ा वर्ग वसुंधरा के पक्ष में है. इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए आपको करीब 9 साल पीछे जाना होगा. 2013 की यह घटना करीब 9 साल बाद वसुंधरा का रास्ता रोक रही है.
एक बयान से इस तरह बिगड़ा खेल!
यह बात है साल 2014 की, 9 साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी भारी बहुमत से सत्ता में आई थी. पार्टी इस नतीजों से गदगद थी. बीजेपी का हर नेता जीत का सेहरा मोदी के सिर बांध रहा था, लेकिन उस वक्त वसुंधरा राजे सिंधिया ने बीजेपी की जीत को सामूहिक मेहनत बताया था. यहां से वह मोदी और मोदी पक्ष के नेताओं की नजरों में आ गईं.
बेटे को मंत्री न बनाए जाने से भी हुईं नाराज
बात यहीं नहीं रुकी. 2014 में ही जब केंद्र में मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले चेहरों की हुई और वसुंधरा से मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले लोगों के नाम मांगे गए तो, उन्होंने शर्त रखी कि वह जो नाम देंगी, उन्हें मंत्री बनाया जाए. यही नहीं शपथ ग्रहण के वक्त वसुंधरा राजे दिल्ली के बीकानेर हाउस में अपने समर्थक सांसदों के साथ बैठी रहीं. कहा जाता है कि ऐसा उन्होंने मोदी पर दबाव डालने के लिए किया था. इतना ही नहीं, जब 2014 में वसुंधरा के बेटे दुष्यंत को मोदी सरकार ने अपने कैबिनेट में शामिल नहीं किया तो वह नाराज हो गईं.
सीएम रहने की वजह से नहीं हुआ नुकसान
राजनीति के कई जानकार कहते हैं कि इन दो घटनाओं के बाद मोदी और वसुंधरा के बीच दूरियां बढ़ गईं थीं और टकराव शुरू हो गया था. हालांकि जिस वक्त ये सब चल रहा था, तब वसुंधरा राजे सीएम के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में थीं. इसलिए उन्हें इस टकराव की वजह से कोई नुकसान नहीं हुआ.
इस वजह से भी पार्टी ने किया किनारा
वसुंधरा राजे अपने पहले कार्यकाल में सबकुछ अच्छे से करती रहीं, लेकिन कहा जाता है कि अपने दूसरे कार्यकाल (2013 में) में वह लोगों से दूर होती गईं. कहा जाता है कि आम लोगों और पत्रकारों की बात तो दूर वसुंधरा पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भी दूर हो गई थीं.
इस चुनाव में भी दिखी खटास
विधानसभा चुनाव से पहले जयपुर में पीएम मोदी की एक चुनावी रैली थी. प्रधानमंत्री मोदी की रैली में महारानी दीया कुमारी मंच का संचालन कर रही थीं. हैरानी की बात ये हुई कि मंच पर मौजूद होने के बाद भी वसुंधरा राजे को बोलने का मौका नहीं दिया गया.
कभी थे बहुत अच्छे संबंध
हमने ऊपर आपको दोनों के बीच दूरी के बारे में बताया, लेकिन कभी दोनों के बीच अच्छे संबंध भी थे. बात है 2003 की जब वसुंधरा राजे पहली बार राजस्थान की सीएम बनने वाली थीं. शपथ ग्रहण समारोह में कई बड़े नेता आए थे. इसी मंच पर नरेंद्र मोदी भी थे, तब वह गुजरात के सीएम के तौर पर पहुंचे थे. वसुंधरा राजे मंच पर आकर पहले लोगों का अभिवादन लेती हैं, इसके बाद मोदी के पैर छूने के लिए आगे बढ़ती हैं. यह देख मोदी भी हैरान रह जाते हैं और वसुंधरा को रोकते हैं. तब दोनों के बीच बहुत बेहतर संबंध थे. तब मोदी भी नए-नए सीएम बने थे.
ये भी पढ़ें
CM Submit Suspense: ‘बीजेपी के भीतर अंदरूनी लफड़ा’, सीएम के नाम पर चल रहे सस्पेंस के बीच बोले अधीर रंजन चौधरी



