सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का एक फैसला बरकरार रखते हुए कहा है कि किरायेदार के पर्यावरण नियम उल्लंघनों के लिए मकान मालिक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. सोमवार (8 जून, 2026) को कोर्ट ने एनजीटी के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि किरायेदार की केमिकल यूनिट से हुए पर्यावरण नियमों के उल्लंघनों के लिए मकान मालिक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
एनजीटी का यह आदेश 14 नवंबर, 2025 का है, जिसमें जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें एनजीटी के आदेश को चुनौती दी गई थी.
एनजीटी ने सूरत के एक मकान मालिक को उसके किरायेदार की केमिकल यूनिट की वजह से हुए पर्यावरण नियमों के उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले जीपीसीबी के आदेश को रद्द कर दिया था. यह मामला पर्यावरणीय क्षति के लिए 25 लाख रुपये के मुआवजे का है, जिस पर एनजीटी ने कहा था कि मकान मालिक जगमोहन लचीराम जालान को यह मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जो उनके रेंटेड एरिया में लगी केमिकल यूनिट का परिणाम है.
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यह मामला जीपीसीबी की ओर से जारी बंदी निर्देश के बाद शुरू किया गया था, जो एक ऐसी कंपनी के खिलाफ था जो ‘डाई-इंटरमीडिएट’ विनिर्माण कार्य में संलग्न थी और कंपनी ने अनिवार्य सहमति की आवश्यक शर्तों का पालन नहीं किया था. निरीक्षण टीम ने पाया कि उस यूनिट के अपशिष्ट जल के नमूने निर्धारित अनुमेय सीमा से अधिक थे, जिसकी वजह से प्रदूषण बोर्ड ने 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया.
जगमोहन जालान ने तर्क दिया था कि उन्होंने साल 2020 में एक समझौते के तहत एक निजी कंपनी के निदेशक को वह परिसर किराए पर दिया था और उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि वह एक बिना लाइसेंस वाली यूनिट है. उन्होंने बाद में किरायेदार के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उनके अभ्यावेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया. जीपीसीबी ने 2024 में जुर्माने को बरकरार रखा था.
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