जम्मू-कश्मीर पर चर्चा के दौरान हर बार याद किया जाता है 'सूफीवाद', भारत में इसका इतिहास और प्रभाव क्या था?

जम्मू-कश्मीर पर चर्चा के दौरान हर बार याद किया जाता है 'सूफीवाद', भारत में इसका इतिहास और प्रभाव क्या था?



<p model="text-align: justify;">सूफीवाद अक्सर चर्चाओं में आ जाता है. हालांकि हर व्यक्ति को इसके इतिहास और इस शब्द के अर्थ की जानकारी नहीं होती. दरअसल ‘सूफीवाद’ या कहें तसव्वुफ, ये इस्लाम में आध्यात्म की खोज की एक रहस्यमयी प्रणाली है. जिसकी शुरुआत लगभग 7वीं शताब्दी में मानी जाती है. इसे शुरू करने वाले रहस्यवादियों ने ये घोषणा की थी कि उन्होंने अल्लाह के ज्ञान को पाने का तरीका खोज लिया है.&nbsp;</p>
<p model="text-align: justify;">साल 1959 में कश्मीर की यात्रा पर गए विनोबा भावे ने ये बात कही थी कि कश्मीर की समस्या का समाधान सियासत और मजहब से नहीं अध्यात्म और विज्ञान से होगा. वो मानते भी थे कि राजनीति और मजहब का सांगठनिक स्वरूप शांति और स्थिरता से ज्यादा अशांति देने वाला बन गया है. ऐसे में कश्मीर में लोगों के दिलों में आई दरार को यदि कम करना है तो उस परंपरा को याद करना होगा और उसे बढ़ाना होगा जो तमाम तरहके पाखडों को कम कर लोगों को एक करने का काम करे. दरअसल विनोबा भावे कश्मीर की सूफी परंपरा के बारे में बात कर रहे थे. जो इतिहास और कट्टरता को पिघला कर उदार करने वाली मानी जाती है.&nbsp;</p>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>सूफीवाद का अर्थ</sturdy><br />’सूफी’ शब्द अरबी के ‘सूफ’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘वो जो ऊन से बने कपड़े पहनता है’. इसका एक कारण ये है कि ऊनी कपड़ों को आमतौर पर फकीरों से जोड़कर देखा जाता था. वहीं इस शब्द को ‘सफा’ भी कहा जाता है जिसका अरबी में अर्थ ‘शुद्धता’ होता है.</p>
<p model="text-align: justify;">सूफीवाद में अल्लाह के करीब जाने के सात तरीके बताए गए हैं. जो पश्चाताप, संयम, त्याग, गरीबी, धैर्य, ईश्वर पर भरोसा और ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण है. वहीं सूफीवाद को तीन चरणों में बांटकर भी देखा जाता है.</p>
<ul>
<li model="text-align: justify;">पहला चरण (खानकाह)- सूफीवाद के पहले चरण की शुरुआत 10वीं शताब्दी में मानी जाती है, जिसे स्वर्ण रहस्यवाद का युग भी कहा जाता है.</li>
<li model="text-align: justify;">इसके दूसरे चरण की शुरुआत 11-14वीं शताब्दी में मानी जाती है. जब सूफीवाद को संस्थागत बनाया जा रहा था और परंपराओं एवं प्रतीकों को इसके साथ जोड़कर देखा जाने लगा था.</li>
<li model="text-align: justify;">तीसरा चरण (तारिफा)<sturdy>-</sturdy> &nbsp;सूफीवाद का तीसरा चरण 15वीं शताब्दी में शुरू हुआ माना जाता है. इस स्तर पर सूफीवाद एक लोकप्रिय आंदोलन बनकर सामने आया था.&nbsp;</li>
</ul>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>’सूफीवाद’ की शुरुआत</sturdy><br />सूफीवाद की शुरुआत 7वीं शताब्दी में मानी जाती है. धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया. 8वीं सदी में सूफी मठवासी समुदायों की स्थापना की गई. जहां भक्त रहस्यमय अभ्यास करते थे. वहीं मध्य युग में महान सूफी संप्रदायों की भी स्थापना की गई जिनके बड़ी संख्या में अनुयायी थे. 9वीं शताब्दी तक इसे उन रहस्यवादियों से जोड़कर देखा जाने लगा जो मोटे ऊनी कपड़े या सूफू पहनते थे. फिर बाद में इसे सभी रहस्यवादियों से जोड़कर देखा जाने लगा चाहे वो तपस्वी प्रथाओं का पालन करते हों या नहीं.</p>
<p model="text-align: justify;">सूफीवाद इस्लाम में अल्लाह की ओर जाने के मार्ग से जुड़ा था, जिसमें भौतिकतावाद से दूरी थी. साथ ही उस समय की सामाजिक और राजनीति से दूरी बनाने की इच्छा रखने वाले भी सूफीवाद की ओर बढ़ रहे थे. ये सांसारिकता से दूर अल्लाह का मार्ग प्रशस्त करने का बेहद शांतिपूर्ण तरीका बताया जाता था.</p>
<p model="text-align: justify;">9वीं शताब्दी में सूफीयों ने ये दावा किया कि उनके पास अल्लाह का रहस्यमय ज्ञान प्राप्त करने के तरीके हैं. सूफीयों को उस समय तीर्थयात्रा पर निकले फकीर के रूप में जाना जाता था जो सात चरणों पश्चाताप, संयम, त्याग, गरीबी, धैर्य, ईश्वर में विश्वास और ईश्वर की इच्छा के प्रति सहमति के जरिए चेतना के उच्च स्तर को प्राप्त करने का मार्ग दिखाते थे. कुछ सूफीयों का मानना था कि अल्लाह के साथ मिलने का अनुभव शब्दों में बताया नहीं जा सकता.&nbsp;</p>
<p model="text-align: justify;">11वीं सदी के अंत और 12वीं सदी की शुरुआत में इस्लामी दार्शनिक और धर्मशास्त्री अल गजाली ने रूढ़िवाद को रहस्यवाद से जोड़ दिया. उन्होंने सूफीवाद बाकी पहलुओं पर जोर नहीं दिया. उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अल्लाह की प्राप्ति की कोशिश करना चाहिए लेकिन ये भी ध्यान रखना चाहिए कि बाकी समुदाय के साथ शांति से रहना है. हालांकि यही वो सदी थी जब सूफीवाद परंपराओं और प्रतीकों से जुड़ा था.</p>
<p model="text-align: justify;">खानकाहों के उद्धव के बाद सूफीवाद कश्मीर में आया था और इस्लामिक दुनिया में कई जगहों पर ये सक्रिय हो गया था. हालांकि कश्मीर में मुस्लिम शासन की स्थापना 720 से 1320 के बीच मानी जाती है. फिर भी इस बात के प्रमाण मिले हैं कि कश्मीर में मुस्लिम शासन की स्थापना से बहुत पहले ही मुस्लिम शासन ने अपनी पैठ बना ली थी. इसी सदी में सैय्यद अली हमदानी, मीर मुहम्मद, सैय्यद जमालुद्दीन बुखारी और सैय्यद इस्माइल शमी जैसे आगे के सूफियों ने तेजी से कश्मीर में प्रवेश करना शुरू कर दिया था. वहीं 15वीं शताब्दी की शुरुआत में सूफीवाद एक लोकप्रिय आंदोलन बनकर सामने आया था. जब कई लोग सूफीवाद की ओर आगे बढ़े थे.</p>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>प्रमुख सूफी सिलसिले</sturdy></p>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>चिश्ती-</sturdy> चिश्तिया सिलसिला की स्थापना भारत में ख्वाजा मोइन-उद्दीन चिश्ती ने की थी. जिसमें ईश्वर के साथ एकात्मकता (वहदत अल-वुजुद) के सिद्धांत पर जोर दिया गया था और इस सिलसिले के सदस्य शांतिप्रिय थे. उन्होंने सभी भौतिक वस्तुओं को अस्वीकार कर दिया था. इसके अलावा वो धर्मनिरपेक्ष राज्य के साथ संबंध से दूर रहे. उन्होंने भगवान के नामों का जोर से और चुपचाप पाठ (धिकर जाहरी, धिकर खफी), चिश्ती अभ्यास की आधारशिला का निर्माण किया. चिश्ती की शिक्षाओं को ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर, निजामुद्दीन औलिया और नसीरुद्दीन चरघ जैसे ख्वाजा मोइन-उद्दीन चिश्ती के शिष्यों द्वारा आगे बढ़ाया तथा लोकप्रिय बनाया.</p>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>सुहरावर्दी सिलसिला-</sturdy> इसकी स्थापना शेख शहाबुद्दीन सुहरावार्दी मकतूल द्वारा की गई थी. चिश्ती सिलसिले से ठीक उलट सुहरावर्दी सिलसिले को मानने वालों ने सुल्तानों, राज्य के संरक्षण और अनुदान को स्वीकार किया था.</p>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>नक्शबंदी सिलसिला-</sturdy> इसकी स्थापना ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंदी ने की थी. शुरुआत से ही इस सिलसिले के फकीरों द्वारा शरीयत का पालन करने पर जोर दिया गया था.</p>
<p model="text-align: justify;"><sturdy>कदिरिया सिलसिला-</sturdy> ये पंजाब में लोकप्रिय काफी पॉपुलर था. इसकी स्थापना शेख अब्दुल कादिर गिलानी ने 14वीं शताब्दी में की थी. वो अकबर के अधीन मुगलों के समर्थक थे.&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>