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HomeIndiaस्मार्टफोन की लत बच्चों के लिए क्यों बनती जा रही है खतरनाक?

स्मार्टफोन की लत बच्चों के लिए क्यों बनती जा रही है खतरनाक?



<p fashion="text-align: justify;">जिंदगी कितनी आसान हो जाती है न, जब दुनिया की सारी जानकारियां महज एक छोटे से डब्बे में समा जाए और आपका जब भी मन हो उस डब्बे को अनलॉक कर उन जानकारियों को पा सके. जी हां, सही सोच रहे हैं हम बात मोबाइल फोन की ही कर रहे है. आज के समय में मोबाईल का इस्तेमाल कितना आम हो गया है ये तो शायद ही किसी को बताने की जरूरत है.</p>
<p fashion="text-align: justify;">हमने अपने घरों में कितनी ही बार कहते सुना होगा कि उनका बच्चा इतना स्मार्ट है कि वह 2 साल की उम्र में ही फोन खोलकर गेम खेल लेता है. या फिर उनका बच्चा मोबाइल फोन देखे बिना खाना ही नहीं खाता. माता-पिता को अपने बच्चे के फोन ज्ञान पर गर्व होता है. लेकिन उन्हीं माता-पिता का ये जानना भी बेहद जरूरी है कि &nbsp;मोबाइल फोन का इस्तेमाल न सिर्फ उनके बच्चों को मानसिक तौर पर कमजोर कर रहा है बल्कि लगातार फोन का इस्तेमाल इंसान को शारीरिक तौर पर भी बीमार बना रहा है.</p>
<p fashion="text-align: justify;">छोटी उम्र के बच्चों के फोन के इस्तेमाल का आंकड़ा चौंकाने वाला सामने आया है. इस आंकड़े के अनुसार हर डेढ़ साल का बच्चा 5 घंटे तक मोबाइल में खोया रहता है. इसके अलावा सेपियन लैब्स की एक ताजा रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें जेन Z यानी 18-24 साल की उम्र वाले 27,969 लोगों के डेटा का इस्तेमाल किया गया है. &nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">इस रिपोर्ट में बचपन से स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने के वाले बच्चों के वर्तमान मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंधों के बारे में पता लगाने की कोशिश की गई है. रिपोर्ट के अनुसार जिन लोगों ने बहुत छोटी उम्र से मोबाइल पर बहुत ज्यादा समय बिताना शुरू कर दिया था, उनमें मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दिक्कतें ज्यादा देखी गई हैं.</p>
<p fashion="text-align: justify;">इसी रिपोर्ट में बताया गया कि जिन पुरुषों को 6 साल की उम्र में पहली बार स्मार्टफोन मिला था उनकी तुलना में 18 साल की उम्र में फोन का इस्तेमाल करने वालों में मानसिक विकारों के विकास का खतरा 6 प्रतिशत ज्यादा है. वहीं महिलाओं की बात करें तो उनमें यह जोखिम लगभग 20 प्रतिशत अधिक ज्यादा था. &nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम जैसी बीमारियां दे रहा मोबाइल&nbsp;</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">ज्यादा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना लोगों को डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम जैसी बीमारी दे रहा है. कोरोना महामारी के कारण हुए लॉकडाउन ने भारत सहित दुनिया के सभी देशों में डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा दिया है. घर में महीनों तक बंद रहने के कारण अधिकांश लोगों को एक दूसरे से बातचीत करने और अपनी नौकरी की जिम्मेदारियों को जारी रखने के लिए डिजिटल उपकरणों का सहारा लेना पड़ा.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">अब भले ही कोरोना खत्म हो गया हो लेकिन ऑनलाइन शिक्षण सेवाओं और ज़ूम- गूगल मीट जैसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफार्मों का इस्तेमाल लगातार बढ़ता ही जा रहा है. कामकाजी व्यस्क के अलावा बच्चे भी पढ़ाई करने के लिए इन प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">इसके अलावा, बच्चों द्वारा सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय भी काफी बढ़ गया है. जो कि युवाओं में डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम का कारण बन रहा है.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>क्या है डिजिटल आई स्ट्रेन</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">आई स्पेशलिस्ट डॉ. सुमित सिंह ने एबीपी से बात करते हुए कहा कि, &ldquo;आज के समय में ज्यादातर बच्चों में आंख संबंधी परेशानियां आती है. उनकी आंखों में सूखापन, खुजली, रेडनेस, पानी आना और रोशनी कमजोर होना तो जैसे आम हो गया है." उन्होंने कहा आंखों से जुड़े लक्षणों का मुख्य कारण पलक झपकने की दर का कम होना है जो नेत्र की सतह को प्रभावित करता है.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">सुमित आगे कहते हैं, ‘ ज्यादातर समय स्क्रीन पर गुजारने के कारण लोगों की आंखों में थकान और भारीपन आना बहुत आम बात हो गया है. डिजिटल स्क्रीन का बढ़ा हुआ समय समायोजनात्मक ऐंठन (Accommodative Spasm) का कारण बनता है. जिससे जब बच्चे दूर की वस्तुओं को देखने की कोशिश करते हैं तो उनकी आई साइट धुंधली हो जाती है.</p>
<p fashion="text-align: justify;">सुमित आगे कहते हैं कि, ‘जो बच्चे ज्यादातर समय डिजिटल स्क्रीन पर देखते हुए बिता रहे हैं उनमें सिरदर्द, गर्दन में अकड़न, कंधे और पीठ में दर्द जैसे लक्षण भी आम तौर पर देखे जाते हैं. चूंकि डिजिटल उपकरण हमारे बच्चों की जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं, इसलिए डिजिटल आई स्ट्रेन के बारे में अधिक जागरूकता पैदा करने की जरूरत है.'</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>डिजिटल स्ट्रेन के कारण&nbsp;</robust></p>
<ul>
<li fashion="text-align: justify;">खराब रोशनी</li>
<li fashion="text-align: justify;">लैपटॉप या फोन का इस्तेमाल करते वक्त गलत मुद्रा में बैठना.</li>
<li fashion="text-align: justify;">स्क्रीन की चकाचौंध</li>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों की समस्या का सही समय पर इलाज नहीं किया जाना</li>
<li fashion="text-align: justify;">गलत दूरी से कंप्यूटर का उपयोग करना</li>
</ul>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>डिजिटल आई स्ट्रेन का लक्षण</robust></p>
<ul>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों से लगातार आंसू आना&nbsp;</li>
<li fashion="text-align: justify;">दृष्टि कमजोर होना&nbsp;</li>
<li fashion="text-align: justify;">सिरदर्द</li>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों का लाल होना</li>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों का सूखापन</li>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों में बेचैनी</li>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों में खुजली</li>
<li fashion="text-align: justify;">कंधे का दर्द</li>
<li fashion="text-align: justify;">आंखों में थकान</li>
</ul>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>कितने साल की उम्र तक बच्चों को रखना चाहिए फोन से दूर&nbsp;</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">आई स्पेशलिस्ट डॉक्टर मनु तनेजा ने एबीपी से बातचीत में बताया कि कम से कम दो साल तक के बच्चे को तो मोबाइल से ज्यादा से ज्यादा दूर रखने की कोशिश करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर बच्चा मोबाइल लेने की या गेम खेलने की जिद करता है तो माता-पिता को उन्हें अलग अलग एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. बच्चों के मन में मोबाइल की जगह किताबों के लिए, पार्क में घूमने, दोस्तों के साथ खेलने के लिए जगह बनाना बेहद जरूरी है.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>मोबाइल फोन मानसिक तौर पर कैसे कर रहा असर&nbsp;</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">मनोवैज्ञानिक मनीषा फरमानिया ने एबीपी से बातचीत करते हुए कहा कि कम उम्र के बच्चों में मोबाइल की लत के बहुत सारे खतरे सामने आए हैं. इनमें वर्चुअल ऑटिज्म का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जा रहा है. कुछ दिन पहले ही एक रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार दुनिया भर में बच्चे वर्चुअल ऑटिज्म &nbsp;का तेजी से शिकार हो रहे हैं.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">वर्चुअल ऑटिज्म दरअसल ऐसी अवस्था है जिसमें डिजिटल डिवाइस पर ज्यादातर समय बिताने वाले बच्चा दूसरों से बातचीत करने में दिक्कत महसूस करने लगता है. ये स्थिति सवा साल से छह साल तक बच्चों में ज्यादा देखी जा रही है. &nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">मनोवैज्ञानिक ने आगे कहा क्योंकि बच्चों का ज्यादातर वक्त मोबाइल या टीवी में बीत रहा है इसलिए वह आम जिंदगी में लोगों के बात को समझने में दिक्कत महसूस करने लगते हैं. इसका नकारात्मक प्रभाव यह होता है कि ऐसे बच्चों का स्पीच डेवलपमेंट नहीं हो पाता. ऐसे में बच्चे दूसरे व्यक्ति के सामने या बातचीत में सहज नहीं हो पाते हैं और उनका सामाजिक दायरा कमजोर होने लगता है.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>वर्चुअल ऑटिज्म से बच्चों को कैसे बचाया जाए&nbsp;</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">राइट टू प्ले इनिशिएटिव के डायरेक्टर और द श्रीराम मिलेनियम स्कूल (The Shriram Millennium Faculty) में फिजिकल एजुकेशन के टीचर जावेद अख्तर ने एबीपी से बात करते हुए कहा कि अगर बच्चों का शेड्यूल सही से बनाया जाता है तो उन्हें वर्चुअल ऑटिज्म &nbsp;का शिकार होने से बचाया जा सकता है. इसके लिए बच्चों को फोन या मोबाइल से दूर करना होगा और फिजिकल एक्टिविटी, खेल और दूसरी एक्टिविटीज में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. ऐसा करने से बच्चे न सिर्फ गैजेट पर कम निर्भरता को कम करेंगे बल्कि ज्यादा लोगों से मिलने जुलने पर उसका सामाजिक दायरा भी बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करने के लिए उनके दिन भर के शेड्यूल इस तरह बनाया जाया जाना चाहिए कि वो पूरा दिन व्यस्त रहे.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>डिप्रेशन तक के हो रहे हैं शिकार&nbsp;</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में बाल और किशोर मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख बेंजामिन मैक्सवेल ने एक रिपोर्ट में कहा कि, हमारे पास ज्यादातर ऐसे किशोर आ रहे हैं, जो छोटी उम्र से ही स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं और आज के तारीख में वह मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से परेशान हैं. &nbsp;गंभीर साइबर बुलिंग से लेकर डिप्रेशन तक के मामले किशोरों की क्वालिटी ऑफ लाइफ खराब कर रहे हैं.</p>
<p fashion="text-align: justify;">उन्होंने कहा कि एक दूसरे से मिलते जुलते रहना और सोशल कनेक्शन हर किसी के लिए आवश्यक है, मोबाइल फोन्स ने इसे खत्म सा कर दिया है. ऐसी आदत बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अच्छी नहीं है. माता-पिता को अगर लगता है कि उनका बच्चा कम उम्र में ही आपसे बेहतर मोबाइल चला रहा है, और इस बात पर उन्हें गर्व भी हो रहा है तो सावधान हो जाइए यह एडवांस होने का नहीं बीमारी का संकेतक है.</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>दिन भर में कितना समय स्क्रीन को देना खतरनाक नहीं है?</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">इस सवाल के जवाब में मनोवैज्ञानिक मनीषा फरमानिया कहती है कि रिसर्च और मेरा जो अनुभव है उसके अनुसार बच्चों को दिन भर में 4 घंटे से कम समय तक मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर का इस्तेमाल करने की अनुमति देनी चाहिए . इसके अलावा माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे 20/20/20 नियम का पालन करें. यानी हर 20 मिनट के स्क्रीन टाइम के बाद, 20 सेकंड का ब्रेक, इस ब्रेक के दौरान बच्चों को 20 फीट की दूरी पर स्थित किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;">इसके अलावा आंखों के सूखापन, जलन और दर्द को ठीक करने के लिए डॉक्टर द्वारा बताया गया आई ड्रॉप का इस्तेमाल करना चाहिए. आई ड्रॉप न सिर्फ आंखों की नमी बनाए रखने का काम करते है, बल्कि रेडनेस, जलन और पलकों पर होने वाले दर्द से भी बचाता है.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>बच्चों का मोबाइल फोन एडिक्शन कितना खतरनाक</robust></p>
<p fashion="text-align: justify;">आज के समय में बच्चों के हाथों में आसानी से पहुंच रहे स्मार्टफोन के कई नुकसान हो रहे हैं.&nbsp;</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>1. गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ना-</robust> छोटी उम्र में स्मार्टफोन की लत बच्चों में गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. अगर बच्चे को फोन का ज्यादा इस्तेमाल करने से रोका जाता है तो उनमें गुस्सा होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. फोन छीनने के अलावा नेटवर्क का न आना या फोन की बैटरी खत्म होने पर अक्सर ये रूप दिखता है.</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>2. फोन पर निर्भरता बढ़ना:</robust> इन दिनों इंसान टेक्नोलॉजी पर इतना ज्यादा निर्भर हो गया है कि इसके ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण निर्भरता बढ़ रही है और कई बार फोन की अनुपस्थिति में ये मुश्किल में डालने वाली है.</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>3. खेल-कूद में रुचि कम होना</robust>- बच्चों स्मार्ट फोन में ही गेम खेल ले रहे हैं. ऐसा करना उनके शारीरिक और मानसिक विकास को बाधित कर रहा है.</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>4. गलत कामों की बढ़ती प्रवृति</robust>- हाल ही में पंजाब में दो ऐसे मामले आए थे, जिनमें 16 और 17 साल के लड़कों ने अपने घरवालों से छुपकर PUBG मोबाइल गेम में लाखों रुपये उड़ा दिए थे. इसके अलावा 2-3 साल पहले ब्लू व्हेल गेम के कारण कई बच्चों ने आत्महत्या कर ली थी, जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाला मामला था.</p>
<p fashion="text-align: justify;"><robust>5. साइबर अपराध के शिकार</robust>- आधुनिक दौर में साइबर अपराध सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है और बच्चों के मामले में ये और भी खतरनाक है, क्योंकि ऐसे अपराधी स्मार्टफोन को भेदकर अहम जानकारी चुरा सकते हैं, जो बच्चों के जीवन और भविष्य को नुकसान पहुंचा सकता है.</p>

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