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इलेक्टोरल बॉन्ड बना बीजेपी के लिए फाँस, बदला लोक सभा चुनाव का माहौल, पीएम मोदी के लिए जवाब देना हो रहा है मुश्किल



<p type="text-align: justify;">इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला इस वर्ष 15 फरवरी को आया था. इस फ़ैसले से पहले लोक सभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल कुछ अलग था. सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद माहौल तेज़ी से बदला. जब तक इलेक्टोरल बॉन्ड असंवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी घोषित नहीं हुआ था, माहौल काफ़ी हद तक बीजेपी के पक्ष में दिख रहा था. विपक्ष के लिए लोक सभा चुनाव की राह बेहद कठिन लग रही थी.</p>
<p type="text-align: justify;">अयोध्या में 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक भव्य कार्यक्रम के माध्यम से राम मंदिर का उद्घाटन करते हैं. इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद रहते हैं. ऐसा प्रचारित-प्रसारित किया गया था कि इस मंदिर से पूरे देश के धार्मिक माहौल को एक नया आयाम मिल गया. कार्यक्रम धार्मिक था, इसके बावजूद जिस तरह से मंदिर उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत ने भाषण दिया था, वो ऐसा लग रहा था जैसे देशवासियों के नाम संबोधन हो. उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम नेता लगातार तीसरे कार्यकाल को लेकर विश्वास से लबरेज़ नज़र आ रहे थे.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>राम मंदिर के बाद बीजेपी का सीट को लेकर दावा</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इस धार्मिक माहौल से गाढ़ा हुए राजनीतिक भगवा रंग का ही असर था कि बीजेपी ने अपने लिए 375 पार और एनडीए के लिए 400 पार का विमर्श गढ़ लिया. मौजूदा मोदी सरकार का आख़री संसद सत्र 31 जनवरी से लेकर 10 फरवरी तक चला था. यह संक्षिप्त बजट सत्र था, जिसमें अंतरिम बजट को मंज़ूरी मिली थी. यह 17वीं लोक सभा का आख़िरी सत्र था. इस सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाक़ा’इदा संसद में दावा किया था कि बीजेपी 375 सीट का आँकड़ा पार करने जा रही है और एनडीए का आँकड़ा 400 पार करने जा रहा है.</p>
<p type="text-align: justify;">राम मंदिर से बने माहौल से बीजेपी के साथ ही मोदी सरकार भी बेहद उत्साहित और उतावली थी. यही कारण था कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अंतरिम बजट भाषण में बाक़ा’इदा लिखा हुआ था कि जुलाई में मोदी सरकार ही पूर्ण बजट पेश करेगी. यह भारतीय संसदीय प्रणाली के इतिहास में पहली बार हुआ था कि कोई सरकार इस तरह का राजनीतिक दावा सरकारी दस्तावेज़ में लिखकर कर रही थी. बजट भाषण राजनीतिक दस्तावेज़ नहीं है. यह पूरी तरह से सरकारी दस्तावेज़ है. उसके बावजूद मोदी सरकार की ओर से ऐसा किया गया था, जो एक तरह से लोक सभा चुनाव के महत्व को कम करने जैसा ही था.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>लोक सभा चुनाव और बीजेपी का अति आत्मविश्वास</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर मेरा मानना है कि राजनीतिक तौर से मोदी सरकार और बीजेपी में इतना आत्मविश्वास आने का बड़ा कारण हिन्दु-मुस्लिम धर्म के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना और राम मंदिर का रहा है. इसमें शक-ओ-शुब्हा की कोई गुंजाइश नहीं है. बीजेपी मानकर चल रही थी कि चेहरे से लेकर मुद्दों पर विपक्ष उसके सामने कमज़ोर है. राम मंदिर के उद्घाटन के पहले ही मोदी सरकार ने यह भी एलान कर दिया था कि लोक सभा चुनाव से पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 या’नी सीएए को लागू कर दिया जाएगा. बीजेपी को उम्मीद थी कि इससे लोक सभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के उसके दावे को और मज़बूती मिलेगी.</p>
<p type="text-align: justify;">अपनी पार्टी की ताक़त, कमज़ोर विपक्ष और विपक्ष में बिखराव को देखते हुए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व 2019 से भी बड़ी जीत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त था. बीजेपी को लग रहा था कि विपक्ष के पास ऐसा कोई दमदार मुद्दा नहीं है, जिसको आधार बनाकर विपक्ष लोक सभा की सियासी लड़ाई में उसके सामने मज़बूत चुनौती पेश कर पाएगा. इस वर्ष के छोटे से बजट सत्र की समाप्ति या’नी 10 फरवरी तक बीजेपी पूरी तरह से आश्वस्त हो गयी थी कि अब राजनीतिक माहौल नहीं बदलने वाला है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>दक्षिण राज्यों में दयनीय स्थिति के बावजूद दावा</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">बीजेपी को एहसास था कि दक्षिण भारतीय राज्यों में उसके लिए अधिक गुंजाइश नहीं है. बीजेपी की स्थिति ख़ासकर तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश में बेहद दयनीय है. इन तीनों राज्यों में बीजेपी खाता खोल ले, यही उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी. उसी तरह से कर्नाटक और तेलंगाना में भी बीजेपी की स्थिति उतनी मज़बूत नहीं दिख रही है. हालाँकि इन राज्यों में भी बीजेपी ख़ूब मेहनत कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार दौरा कर रहे हैं. लेकिन यह हक़ीक़त है कि उन राज्यों में बीजेपी को उन फैक्टर के आधार पर समर्थन नहीं मिलने वाला है, जैसा उत्तर भारत के राज्यों में मिलता है. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को भी इस बात का ब-ख़ूबी भान है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>आंध्र प्रदेश में सियासी माहौल बीजेपी के पक्ष में नहीं</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">आंध्र प्रदेश में एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और पवन कल्याण की जन सेना पार्टी के साथ बीजेपी का गठबंधन है. इसके बावजूद वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख और प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की ताक़त को देखते हुए बीजेपी के लिए आंध्र प्रदेश में कुछ ख़ास कर पाने की संभावना कम ही है. इसके साथ ही जगन मोहन रेड्डी की बहन वाई. एस. शर्मिला ने जब से प्रदेश में कांग्रेस की कमान संभाली है, आंध्र प्रदेश की राजनीति में हलचल और बढ़ गयी है. ढाई महीने में ही वाई. एस. शर्मिला ने ऐसा माहौल बना दिया है, जिससे आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को लेकर उम्मीदें बढ़ गयी हैं. यहाँ कांग्रेस अगर मज़बूत होती है, तो इसका सीधा असर जगन मोहन रेड्डी की पार्टी पर पड़ेगा ही, इसके साथ ही चंद्रबाबू नायडू की स्थिति और भी डाँवाडोल हो सकती है. अगर ऐसा होता है, तो, इससे सीधे-सीधे बीजेपी के साथ एनडीए को नुक़सान पहुँचेगा.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>बीजेपी के लिए कर्नाटक में 2019 जैसा प्रदर्शन मुश्किल</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">कर्नाटक की बात करें, तो, बीजेपी के लिए 2019 जैसा प्रदर्शन करना एक तरह से असंभव वाली स्थिति है. यहाँ मई, 2023 में कांग्रेस की सरकार बनने से बीजेपी की मुश्किल बढ़ गयी है. बीजेपी ने 2019 में यहाँ की कुल 28 में से 25 लोक सभा सीट जीतने में कामयाब हुई थी. वहीं कांग्रेस को महज़ एक सीट पर जीत मिली थी. अब यहाँ हालात बदल चुका है. कांग्रेस की स्थिति 2019 जैसी कमज़ोर नहीं है. नुक़सान की आशंका के मद्द-ए-नज़र इस बार बीजेपी कर्नाटक में एच. डी. देवगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है. इसके बावजूद कांग्रेस की मज़बूती के कारण यहाँ बीजेपी को नुक़सान होगा, इसकी भरपूर संभावना है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>तेलंगाना में भी बीजेपी की राह नहीं है आसान</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">तेलंगाना को लेकर भी बीजेपी उतनी आश्वस्त नहीं है. बीजेपी को 2019 में यहाँ की कुल 17 में से 4 लोक सभा सीट पर जीत मिली थी. पिछले साल नवंबर में हुए विधान सभा चुनाव में बीजेपी के दावे को ज़बरदस्त झटका लगा था. 2019 के लोक सभा चुनाव में प्रदर्शन से उत्साहित बीजेपी विधान सभा चुनाव के दौरान तेलंगाना में सरकार बनाने का दावा कर रही थी, लेकिन वो महज़ 8 विधान सभा सीट ही जीत पायी. कांग्रेस और बीआरएस के बाद यहाँ बीजेपी तीसरे नंबर पर रही. विधान सभा चुनाव, 2023 में बीजेपी की सीट और वोट शेयर दोनों में पिछले विधान सभा चुनाव या’नी 2018 के मुक़ाबले इज़ाफ़ा हुआ था. लेकिन 2019 के लोक सभा के मुक़ाबले तेलंगाना में बीजेपी का वोट शेयर तक़रीबन 6 फ़ीसदी कम हो गया था. ऐसा तेलंगाना में कांग्रेस की मज़बूत स्थिति होने की वज्ह से हुआ था. बीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव भी अभी तेलंगाना में एक मज़बूत राजनीतिक हैसियत रखते हैं. ऐसे में इस बार बीजेपी के लिए 2019 का प्रदर्शन दोहराना भी आसान नहीं रहने वाला है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>बीजेपी की असली ताक़त वाले राज्यों पर नज़र</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">दक्षिण में कमज़ोर होने के बावजूद बीजेपी 2019 या उससे भी बेहतर जीत को लेकर आश्वस्त थी. उसके इस भरोसे का कारण उत्तर और मध्य भारत के कई राज्यों के साथ ही पूर्वोत्तर राज्य हैं. इनमें गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली के साथ ही पश्चिम बंगाल को लेकर बीजेपी को काफ़ी उम्मीदें हैं. पूर्वोत्तर राज्यों में असम को लेकर बीजेपी काफ़ी आश्वस्त है. बीजेपी को लगता है कि इनमें से अधिकांश राज्यों में शत-प्रतिशत या उसके आस-पास सीट जीतने में एनडीए को कामयाबी मिल जाएगी. शत-प्रतिशत के मामले में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल अपवाद कहे जा सकते हैं, लेकिन इन दोनों राज्यों में भी बीजेपी सबसे अधिक सीट हासिल करने का दावा कर रही है.</p>
<p type="text-align: justify;"><robust><span type="coloration: #e67e23;">इलेक्टोरल बॉन्ड से अचानक बदली राजनीतिक हवा</span></robust></p>
<p type="text-align: justify;">पश्चिम बंगाल में अभी भी ममता बनर्जी का दबदबा है. पश्चिम बंगाल को छोड़ दें, तो, कांग्रेस या बाक़ी विपक्षी दल इन राज्यों में उतने मज़बूत नहीं हैं. इसके बावजूद बीजेपी के भरोसे का कारण विपक्षी दलों की कमज़ोरी नहीं है. बीजेपी को लगता है कि इन राज्यों में उसे धर्म के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण का जमकर फ़ाइदा मिलेगा. राम मंदिर से बने धार्मिक माहौल का लाभ मिलेगा. 2014 और 2019 में बहुत हद तक ऐसा हुआ भी है. मोदी सरकार की आलोचना के लिए कांग्रेस के साथ ही तमाम विपक्षी दल जो भी मुद्दे पिछले कई महीनों से उठा रहे हैं और भविष्य में भी उठाएंगे, उनका असर इन राज्यों में नहीं होगा. बीजेपी को इस बात का पूरा भरोसा था. बीजेपी को न तो मुद्दों का डर था, न ही लगातार दस साल सत्ता में रहने के बावजूद सत्ता विरोधी लहर या’नी एंटी इनकंबेंसी का भय था. बीजेपी को बिल्कुल एहसास नहीं था कि निकट भविष्य में कुछ ऐसा होगा, जिससे लोक सभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हवा अचानक से करवट ले लेगी.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>चुनावी बॉन्ड पर जवाब देना हो रहा है मुश्किल</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इलेक्टोरल बॉन्ड ने उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पश्चिम से लेकर पूर्व तक राजनीतिक हवा बदल दी. इलेक्टोरल बॉन्ड पर फ़ैसले के बाद राजनीतिक वातावरण बदलने लग गया. धीरे-धीरे एक के बाद एक नये ख़ुलासे से अब स्थिति ऐसी हो गयी है कि बीजेपी के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड का मुद्दा राजनीतिक फाँस का रूप ले चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी के तमाम नेताओं के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड पर जवाब देना किसी पहाड़ को पार करने सरीखा हो गया है. सरल शब्दों में कहें, तो, इलेक्टोरल बॉन्ड पर बीजेपी के तमाम नेताओं और प्रवक्ताओं की बोलती बंद हो गयी है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>अचानक से विपक्षी दलों को मिला दमदार मुद्दा</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इलेक्टोरल बॉन्ड के तौर पर विपक्ष को ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसके बारे में देश के अधिकांश लोग अब बात कर रहे हैं. विपक्ष के सामने बतौर चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की काट खोजना मुश्किल लग रहा था. इसके साथ ही लोक सभा चुनाव के मद्द-ए-नज़र राजनीतिक तौर से मुद्दों को गढ़ने की लड़ाई में भी विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ 15 फरवरी से पहले पीछे नज़र आ रहा था. देश की शीर्ष अदालत से जैसे ही इलेक्टोरल बॉन्ड पर फै़सला आता है, विपक्ष को मानो संजीवनी बूटी मिल जाती है. उसके बाद जिस तरह की जानकारी सामने आने लगती है, देखते-ही देखते यह मुद्दा हावी हो जाता है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण से मोदी सरकार कटघरे में</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्ष को ऐसा मुद्दा मिल जाता है, जिसमें मोदी सरकार की मंशा का महत्वपूर्ण पहलू शामिल है. इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी जानकारियों के सार्वजनिक होने के बाद ऐसे-ऐसे तथ्य निकलकर सामने आ रहे हैं, जिससे सरकारी और राजनीतिक तंत्र के दुरुपयोग की कलई खुल जा रही है.</p>
<p type="text-align: justify;">सरकार और बड़ी-बड़ी कंपनियों या कारोबारियों के साथ साँठ-गाँठ से जुड़े पहलू और तथ्य इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारियों से रिस-रिस कर बाहर आ रहे हैं. इनमें हर तरह की कंपनियाँ और कारोबार से जुड़े लोग शामिल हैं. इनमें कई मामले ऐसे हैं, जहाँ केंद्र में सत्ताधारी दल बीजेपी या दूसरे सत्ताधारी दलों को बॉन्ड से करोड़ों का चंदा देने के बाद कुछ कंपनियों को सरकारी प्रोजेक्ट मिला. कुछ मामले ऐसे हैं, जहाँ सरकारी प्रोजेक्ट मिलने के बाद इलेक्टोरल बॉन्ड से कंपनियों की ओर से करोड़ों का चंदा बीजेपी या दूसरे सत्ताधारी दलों को दिए गए हैं. इलेक्टोरल बॉन्ड के घेरे में अंबानी और अडानी परिवार से संबंधित कंपनियाँ भी हैं. एयरटेल से लेकर कोटक महिंद्रा बैंक की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. कई बड़ी-बड़ी दवा कंपनियों तक की भूमिका संदेह के घेरे में है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>ईडी का खेल और राजनीतिक समीकरणों पर ज़ोर</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">अभी दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा केस बेहद सुर्ख़ियों में है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस मामले में ईडी की रिमांड में हैं. शराब घोटाले के नाम से मशहूर इस मामले में भी इलेक्टोरल बॉन्ड का जाल शामिल है. जो शख़्स इस केस में एक बड़ा आरोपी था, अब वो इस मामले में अप्रूवर या’नी सरकारी गवाह बन चुका है. हैदराबाद के कारोबारी और अरबिंदो फार्मा के निदेशक सरथ चंद्र रेड्डी को ईडी ने पहले गिरफ़्तार किया था. बाद में वो सरकारी गवाह बन जाता है. उसे जमानत भी मिल जाती है. इस कंपनी से बॉन्ड के माध्यम से बीजेपी को करोड़ों रुपये का चंदा मिलता है. यह अब छिपी हुई बात नहीं है. इसी सरथ चंद्र रेड्डी की गवाही को मुख्य आधार बनाकर अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी हुई है. इलेक्टोरल बॉन्ड के खेल ने दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े केस को ही नया मोड़ दे दिया है. इसमें एक तरह से मनी ट्रेल की सुई बीजेपी की ओर मुड़ गयी है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>केंद्रीय जाँच एजेंसियों को लेकर भी कई सवाल</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इलेक्टोरल बॉन्ड से जिन तथ्यों का ख़ुलासा हो रहा है, उससे केंद्रीय जाँच एजेंसियों सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय के साथ ही इनकम टैक्स की भूमिका भी संदिग्ध नज़र आ रही है. सबसे अधिक कटघरे में प्रवर्तन निदेशालय या’नी ईडी है. जो व्यक्ति या कंपनी जाँच के घेरे में हैं, सत्ता पर विराजमान राजनीतिक दलों को उन कंपनियों और लोगों से मोटी-मोटी रक़म मिली है. कई मामले तो ऐसे हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड से मोटी राशि बीजेपी को मिलती है और उसके बाद कंपनी या लोगों को केंद्रीय जाँच एजेंसियों से राहत मिल जाती है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>आम लोगों के बीच कई तरह के विमर्श पर चर्चा</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">आम लोगों के बीच कई तरह के विमर्श को बल मिला है. "चंदा दो, धंधा लो", "धंधा लो, चंदा दो" "चंदा नहीं, तो ईडी का फंदा", "हफ़्ता वसूली" जैसे मुहावरे और कहावत इलेक्टोरल बॉन्ड के साथ जुड़ चुके हैं. आम लोग भी अब इलेक्टोरल बॉन्ड पर बात करने में धड़ल्ले से इन मुहावरों या कहावत का प्रयोग कर रहे हैं. विपक्ष को बैठे-बिठाए एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसके आधार पर देशव्यापी तौर से मोदी सरकार को घेरना आसान हो गया है. राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं के लगातार प्रयासों के बावजूद विपक्ष कोई ऐसा मुद्दा नहीं बना पाया था, जिससे देश के हर राज्य और अलग-अलग उम्र के लोगों में बीजेपी के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में मदद मिल सके. इलेक्टोरल बॉन्ड ने इस काम को कर दिया है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>अब इलेक्टोरल बॉन्ड बन चुका है देशव्यापी मुद्दा</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">देश के अलग-अलग हिस्सों में घूमने पर पता चलता है कि इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी धाँधली को लेकर आम लोगों में सुगबुगाहट हर जगह है. शहर से लेकर गाँव-देहातों में, 18-19 साल के नये-नये मतदाताओं से लेकर बुज़ुर्गों में इस मुद्दे पर बातचीत हो रही है. इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े प्रकरण में ऐसे तो बीजेपी के साथ ही तमाम बड़े-बड़े विपक्षी दलों को भी जमकर चंदा मिला है. इलेक्टोरल बॉन्ड का अधिकांश लाभ किसी-न-किसी रूप में उन्हीं दलों तक पहुँचा है, जो या तो केंद्र में सत्ता में थे या राज्यों में सत्ता में थे. यह इलेक्टोरल बॉन्ड की राजनीतिक सच्चाई है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>जवाबदेही के तराज़ू पर तौली जाएगी मोदी सरकार</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इसके बावजूद ज़िम्मेदारी और जवाबदेही के तराज़ू पर मोदी सरकार और बीजेपी को ही तौला जाएगा. इसका कारण है. भले ही इलेक्टोरल बॉन्ड से की राजनीतिक दलों को लाभ हुआ है, लेकिन यह स्कीम मोदी सरकार की मनमानी का नतीजा है. मोदी सरकार चुनाव आयोग और आरबीआई जैसी संस्थाओं के साथ ही विपक्ष की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए इस स्कीम को लेकर आयी थी. इस स्कीम में गड़बड़ी के इतने पहलू शामिल हैं, जिनसे सरकारी और राजनीतिक तंत्र पर आम लोगों का भरोसा डगमगा सकता है. भरोसा टूटा भी है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>मोदी सरकार की मंशा को लेकर हर जगह चर्चा</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इस स्कीम को लाने में संविधान से नागरिक को हासिल मूल अधिकार ‘जानने के हक़’ की धज्जी उड़ाई गयी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू को आधार बनाकर ही इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक क़रार दिया था. नागरिकों के मूल अधिकार से खिलवाड़ किया गया था. मूल अधिकार के ऊपर राजनीतिक दलों की सर्वोच्चता के सिद्धांत को स्वीकार किया गया था. मूल अधिकार से अधिक महत्व डोनर को दिया गया था. डोनर की गोपनीयता के नाम पारदर्शिता को ताक पर रख दिया गया था, जबकि राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता का हवाला देकर स्कीम लाया गया था. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, कंपनी अधिनियम, इनकम टैक्स अधिनियम से लेकर आरबीआई एक्ट तक में मनमाने तरीक़े से बदलाव किया गया था.</p>
<p type="text-align: justify;">सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बॉन्ड से जुड़ी सारी जानकारी देने में जिस तरह से एसबीआई ने आनाकानी की, सिर्फ़ उससे ही मोदी सरकार की मंशा पर कई सवाल उठते हैं. एसबीआई के रवैये से स्पष्ट था कि वो इलेक्टोरल बॉन्ड का यूनीक अल्फा-न्यूमेरिक नंबर नहीं देना चाहती थी. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती के बाद एसबीआई को यह नंबर उपलब्ध कराना पड़ा.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>मोदी सरकार की हो रही है चौतरफ़ा आलोचना</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">सुप्रीम कोर्ट से असंवैधानिक घोषित होने से पहले से ही इस स्कीम की आलोचना देश के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री से लेकर राजनीतिक विश्लेषक और संवैधानिक मामलों के जानकार कर रहे थे. अब तमाम जानकारी बाहर आने के बाद देश के आम लोग भी व्यापक रूप में इस स्कीम से जुड़ी अनियमितता और गड़बड़ी पर बात कर रहे हैं. इसमें संवैधानिक खिलवाड़ से लेकर भ्रष्टाचार के नये-नये रूप का पहलू शामिल हो चुका है. राजनीतिक चंदे में कालेधन को रोकने के मोदी सरकार के दावे की कलई भी खुली है. भ्रष्टाचार, अनियमितता और गड़बड़ी से जुड़े इतने तथ्यों का ख़ुलासा हो रहा है कि अगर सबको एक साथ संकलित कर दिया जाए, तो, न जाने कितने महाकाव्य की रचना हो जाएगी. भ्रष्टाचार से जुड़ी इतनी परत है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जाँच किए बिना पूरी सच्चाई बाहर आना संभव नहीं है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>क्या चुनावी बॉन्ड दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है?</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">अर्थशास्त्री से लेकर राजनीतिक विश्लेषक और संवैधानिक मामलों के जानकार अब खुलेआम इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला बताने लगे हैं. देश के जाने-माने राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषक परकला प्रभाकर ने दावा किया है कि यह स्कीम देश का सबसे बड़ा घोटाला नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा स्कैम है. परकला प्रभाकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति है. वे पहले भी मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं.</p>
<p type="text-align: justify;">दरअसल इसे दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला इसलिए भी कहा जा रहा है कि इसमें सरकारी संरक्षण का पहलू चरम पर है. मोदी सरकार के संरक्षण में करोड़ों रुपये का लेन-देन हो जाता है और बाद में वह स्कीम ही असंवैधानिक घोषित हो जाती है. अब यह कहा जा सकता है कि असंवैधानिक स्कीम के ज़रिये राजनीतिक दलों को करोड़ों रुपये मिले हैं. यहाँ यह भी सवाल है कि अवैध स्कीम से हासिल राशि वैध कैसे हो सकती है. आम लोगों में इस पर भी चर्चा हो रही है. आम लोग इसे गोरखधंधा के तौर पर देख रहे हैं. नागरिक अधिकारों के लिहाज़ से पूरे प्रकरण पर बात कर रहे हैं. आम लोगों के बीच भी चर्चा में सरकारी तंत्र पर देशवासियों के भरोसे का विमर्श इस प्रकरण से पूरी तरह जुड़ गया है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>इलेक्टोरल बॉन्ड पर बीजेपी नेताओं की मजबूरी</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े सवालों पर बीजेपी के बड़े-बड़े नेता लगभग चुप्पी साधकर बैठे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राजनीतिक चंदे में कालेधन को रोकने की दलील देकर बचाव करने की कोशिश की, लेकिन जिस तरह से रोज़ गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की नयी-नयी परतें खुल रही हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि यह स्कीम कालेधन को सफ़ेद करने का नायाब और मुफ़ीद तरीक़ा बन गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मुद्दे पर अपनी बात किसी-न-किसी प्रकार से ज़रूर रखते हैं. हालाँकि इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े सवालों पर वे भी चुप्पी की माला ही जप रहे हैं. टीवी न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया से जुड़े चैनलों पर बीजेपी के तमाम प्रवक्ताओं के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े सवालों का जवाब देना बेहद मुश्किल हो रहा है.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>इलेक्टोरल बॉन्ड सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">वास्तविकता यही है कि लोक सभा चुनाव में इलेक्टोरल बॉन्ड सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है. राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में जिन राज्यों को बीजेपी का मज़बूत क़िला समझा जाता है या बीजेपी जिन राज्यों को अपना गढ़ मानती है, उन राज्यों में भी आम लोगों के बीच इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर सरगर्मी देखी जा सकती है. स्पष्ट है कि इससे गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली के साथ ही पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी की राह आसान से कठिन हो सकती है. भले ही इन राज्यों में चंद सीटों पर असर देखने को मिले, लेकिन ऐसा भी हो गया, तो, यह 400 पार के दावे के लिए बड़ा झटका हो सकता है. एक बात ग़ौर करने वाली है. जब से यह मुद्दा हावी हुआ है, 375 या 400 पार के विमर्श को बीजेपी के तमाम नेता और कार्यकर्ता पहले की तरह नहीं उभार रहे हैं.</p>
<p type="text-align: justify;"><span type="coloration: #e67e23;"><robust>पूरे प्रकरण से बीजेपी को हो सकता है नुक़सान</robust></span></p>
<p type="text-align: justify;">इलेक्टोरल बॉन्ड की वज्ह से राजनीतिक हवा बदलने का बीजेपी को नुक़सान होगा या नहीं, अगर होगा, तो कितना..यह वास्तविक तौर से 4 जून को चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा. इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर मोदी सरकार कटघरे में है. हालाँकि मतदान पर इसका असर पड़ेगा या किस हद तक पड़ेगा, सटीक तौर से इसका अनुमान लगाना किसी के लिए भी संभव नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के फंदे का असर कम करने के लिए बीजेपी को अब चुनाव प्रचार में अधिक मेहनत करनी पड़ेगी. बीजेपी को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज़ियादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की चिंता तब बढ़ती है, जब किसी मसले पर देश के आम लोगों में सुगबुगाहट बढ़ जाती है. ऐसे में कहा जा सकता है कि बीजेपी प्रचार की चुनावी रणनीति में बदलाव करने को विवश ज़रूर हो गयी है. देश की जनता को इसकी झाँकी आगे देखने को मिलेगी.</p>
<p type="text-align: justify;"><robust>[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.] &nbsp;</robust></p>

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